पत्थर

कब से देख रहा हुआ उन पत्थरों को ।

जो अब हैं मेरी ज़िंदगी की पहचान ।।

कभी मंज़िले कभी मुश्किलें ।

ऐसे ही हैं मुक़ाम मेरी ज़िंदगी के ।।