पत्थर
कब से देख रहा हुआ उन पत्थरों को ।
जो अब हैं मेरी ज़िंदगी की पहचान ।।
कभी मंज़िले कभी मुश्किलें ।
ऐसे ही हैं मुक़ाम मेरी ज़िंदगी के ।।
दुआं
ये किसकी दुआंओ ने सर पर हाथ रखा हुआ है ।
हज़ार मुश्किलें फिर भी ज़िंदगी को थाम रखा है ।।
सजा
सजा मे तुम मिलोगे तो बोलो।
हर गुनाह कुबुल कर लूँ ।।
हवा के झोंके
बहुत दूर है उसके शहर से मेरा शहर फिर भी ।
आने वाले हवा के हर झोंके से उसका हाल पूछते हैं ।।
ज़िंदगी
यह समझने में पूरी ज़िंदगी बीत गई की ।
कभी-कभी जिन्दगी भी बेवक्त पूरी हो जाती है ।।
सुर्ख़ियाँ
लिख तू ए दिल कुछ ऐसा सुर्ख़ियो बन अख़बार में आ जाएगा ।।
चोर उच्चकों की करो क़दर क्या पता कोई कब सरकार में आ जाएगा ।।
जान पहचान
जरूरी तो नही कि हर चाहत का मतलब इश्क हो ।
कभी कभी अनजान रिश्तो के लिये भी दिल बेचैन हो जाता है।।
आँधी
आँधी के साथ उड़ गया घर इस परिंदे का ।
कैसे तिनका-तिनका कर बना था धोंसला ये तूफ़ान क्या जाने ।।
खामोशी और सन्नाटा
ख़ामोशी ग़र गुनगुना उठे,नज़र नज़र शोर हो जाये।
सन्नाटा कभी हद से गुज़रे,दर्दे दिल आम हो जाये ।।