श्रेणी: shayri
पत्थर
कब से देख रहा हुआ उन पत्थरों को ।
जो अब हैं मेरी ज़िंदगी की पहचान ।।
कभी मंज़िले कभी मुश्किलें ।
ऐसे ही हैं मुक़ाम मेरी ज़िंदगी के ।।
दुआं
ये किसकी दुआंओ ने सर पर हाथ रखा हुआ है ।
हज़ार मुश्किलें फिर भी ज़िंदगी को थाम रखा है ।।
सजा
सजा मे तुम मिलोगे तो बोलो।
हर गुनाह कुबुल कर लूँ ।।
हवा के झोंके
बहुत दूर है उसके शहर से मेरा शहर फिर भी ।
आने वाले हवा के हर झोंके से उसका हाल पूछते हैं ।।
ज़िंदगी
यह समझने में पूरी ज़िंदगी बीत गई की ।
कभी-कभी जिन्दगी भी बेवक्त पूरी हो जाती है ।।